भिलाई के हाईटेक-अस्पताल में महिला अधिवक्ता की मौत पर हंगामा:इलाज में लापरवाही का आरोप, वकीलों ने मांगा मुआवजा; अस्पताल प्रबंधन बोला-कोई गलती नहीं हुई
By Dinesh chourasiya
दुर्ग के स्मृति नगर के हाईटेक सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में इलाज के दौरान महिला अधिवक्ता बलबीर कौर की मौत के बाद विवाद बढ़ गया है। घटना से नाराज परिजनों और दुर्ग जिला अधिवक्ता संघ के सदस्यों ने अस्पताल के बाहर प्रदर्शन किया और नारेबाजी की।







परिजनों ने अस्पताल पर इलाज में लापरवाही बरतने का आरोप लगाते हुए एक करोड़ रुपए मुआवजे और जिम्मेदार डॉक्टरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की है।
वहीं, अस्पताल प्रबंधन ने सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि मरीज को बचाने के लिए डॉक्टरों की टीम ने हर संभव प्रयास किया था।





कलेक्टर को सौंपा ज्ञापन, जांच की मांग
जिला अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष रमेश शर्मा ने बताया कि संघ ने कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर पूरे मामले की जांच कराने की मांग की है। संघ ने जिला चिकित्सा अधिकारी के माध्यम से मामले की जांच कराने की मांग भी की है।
अधिवक्ता संघ का कहना है कि महिला अधिवक्ता की मौत से जुड़े सभी पहलुओं की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, ताकि सच्चाई सामने आ सके। साथ ही पीड़ित परिवार को एक करोड़ रुपए मुआवजा देने और मामले में जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की गई है।

अस्पताल बोला- इलाज में एक प्रतिशत भी लापरवाही नहीं
हाईटेक अस्पताल के मेडिकल डायरेक्टर डॉक्टर नवील शर्मा ने इलाज में लापरवाही के आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उनका कहना है कि अस्पताल की ओर से किसी भी स्तर पर लापरवाही नहीं बरती गई।
एनेस्थीसिया और दवाइयों की खुराक को लेकर उठ रहे सवालों पर उन्होंने बताया कि मरीज को निर्धारित मात्रा में दवाइयां दी गई थीं। इन दवाइयों के इस्तेमाल के लिए एक्सपर्ट डॉक्टर की जरूरत होती है और अस्पताल में इसके लिए ट्रेंड एक्सपर्ट की टीम मौजूद है।
ऑपरेशन के दौरान बिगड़ी स्थिति, डॉक्टरों ने तुरंत रोकी प्रक्रिया
डॉक्टर नवील शर्मा के अनुसार मरीज का ऑपरेशन शुरू हो चुका था और प्रक्रिया सामान्य रूप से चल रही थी। इसी दौरान मॉनिटरिंग मशीनों में कुछ बदलाव दिखाई दिए।
एनेस्थीसिया एक्सपर्ट ने तुरंत स्थिति को समझा और ऑपरेशन रुकवा दिया। डॉक्टरों को पल्मोनरी एम्बोलिज्म यानी खून का थक्का फेफड़ों की रक्त नलिका में फंसने की आशंका हुई।
इसके बाद मरीज को बचाने के लिए जरूरी दवाइयां दी गईं और सीपीआर भी किया गया। डॉक्टरों ने पहले मरीज की हालत संभालने की कोशिश की। इसके बाद उन्हें आईसीयू में भर्ती किया गया।
वेंटिलेटर पर रखने को लेकर उठे सवालों पर मेडिकल डायरेक्टर ने कहा कि उस समय मरीज की जान बचाना सबसे जरूरी था। ऐसी आपात स्थिति में हर प्रक्रिया के लिए परिजनों की अनुमति का इंतजार करना संभव नहीं होता।
सुबह दोबारा बिगड़ी हालत, नहीं बचाई जा सकी जान
हाईटेक अस्पताल प्रबंधन के मुताबिक, इलाज के दौरान उसी दिन शाम को मरीज का ब्लड प्रेशर सुधरने लगा था और उनकी हालत में कुछ सुधार भी हुआ था। लेकिन अगले दिन सुबह करीब 6 बजे फिर से खून का थक्का बनने या अपनी जगह से खिसकने के कारण उनकी हालत बिगड़ गई।
आईसीयू में भी यही समस्या सामने आई। डॉक्टरों की टीम ने सीपीआर और दूसरे जरूरी इलाज देकर उन्हें बचाने की पूरी कोशिश की, लेकिन उनकी जान नहीं बचाई जा सकी।





