CG में पिता का शव दफनाने सुप्रीम कोर्ट पहुंचा बेटा :SC ने कहा-दुख है कि राज्य-हाईकोर्ट इसे हल नहीं कर पाए; 7 जनवरी से रखा है शव मामला मुस्लिम समुदाय से जुड़ा
By Dinesh chourasiya

छत्तीसगढ़ में एक शख्स अपने पिता का शव दफनाने के लिए कोर्ट का चक्कर काट रहा है। हाईकोर्ट से याचिका खारिज कर होने के बाद अब सुप्रीम कोर्ट की शरण ली है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी देते हुए कहा कि, दुख है कि राज्य और हाईकोर्ट इसे हल नहीं कर पाए।
दरअसल, बस्तर के दरभा निवासी याचिकाकर्ता रमेश बघेल के पिता की 7 जनवरी को मृत्यु हो गई। उनकी मौत के बाद से परिवार ने छिंदवाड़ा गांव के आम कब्रिस्तान में ईसाईयों के लिए सुरक्षित जगह पर उनका अंतिम संस्कार करने की तैयारी की। इसकी जानकारी होने पर गांव के लोगों ने विरोध कर दिया और तनाव के हालात बन गए।







गांव वालों ने कहा, ईसाई व्यक्ति को दफनाने नहीं देंगे
याचिका में बताया गया कि, गांव वालों ने किसी ईसाई व्यक्ति को गांव में दफनाने से इनकार कर दिया। गांव वालों ने कहा कि, चाहे वह गांव का कब्रिस्तान हो या याचिकाकर्ता की अपनी निजी भूमि। इसके बाद रमेश बघेल ने अपने पिता का शव अपनी खुद की जमीन पर दफन करने और सुरक्षा व्यवस्था मुहैया कराने की मांग हाईकोर्ट में रखी।
इसमें बताया गया कि याचिकाकर्ता ने इसके लिए पहले स्थानीय अधिकारियों के साथ ही सरकार से सुरक्षा और मदद मांगी थी। जहां से मदद नहीं मिलने पर उन्हें हाईकोर्ट आना पड़ा। याचिका में कहा कि छत्तीसगढ़ ग्राम पंचायत नियम, 1999 के मुताबिक, मृत व्यक्ति के धर्म के अनुसार अंतिम संस्कार के लिए जगह मुहैया कराना ग्राम पंचायत की जिम्मेदारी है।




राज्य सरकार ने कहा, अलग कब्रिस्तान नहीं है
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की तरफ से जवाब दिया गया। इसमें कहा गया कि ग्राम छिंदवाड़ा में ईसाइयों के लिए कोई अलग कब्रिस्तान नहीं है। हालांकि, उन्होंने आश्वासन दिया कि अगर अंतिम संस्कार गांव छिंदवाड़ा से 20-25 किलोमीटर की दूरी पर किया जाए तो आपत्ति नहीं होगी।
साथ ही बताया गया कि, नजदीकी गांव करकापाल में अंतिम संस्कार किया जा सकता है, जहां ईसाइयों का एक अलग कब्रिस्तान है। शासन का पक्ष सुनने के बाद हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया।
पिता का शव दफनाने अनुमति लेने सुप्रीम कोर्ट पहुंचा बेटा
हाईकोर्ट से भी राहत नहीं मिलने पर बेटे रमेश बघेल ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की। इसमें हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई है। याचिका में बताया गया कि अंतिम संस्कार के अभाव में उसके पिता का शव अब भी अस्पताल में रखा है।
इस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई। जस्टिस बी.वी.नागरत्ना और जस्टिस सत्येश चंद्र शर्मा की बेंच ने आश्चर्य जताया कि, मृतक का शव 7 जनवरी से जगदलपुर के जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज के शवगृह में रखा हुआ है।
हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने जताया दुख
इस मामले की सुनवाई के दौरान शासन की तरफ से जवाब दिया गया कि गांव में ईसाई समुदाय के शव को दफनाने पर विरोध किया जा रहा है। ऐसा इसलिए, क्योंकि गांव में ईसाई कब्रिस्तान नहीं है। शासन ने निजी जमीन पर शव दफनाने पर भी विरोध जताया और कहा कि ऐसा करना भी प्रतिबंधित है, क्योंकि इससे भूमि की पवित्रता पर सवाल उठाया गया है।
शासन का जवाब सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने दुख जताते हुए कहा कि एक मृत व्यक्ति की गरिमा का भी ख्याल नहीं रखा गया। जस्टिस बी.वी.नागरत्ना और जस्टिस सत्येश चंद्र शर्मा की बेंच ने कहा कि, यह दुखद है कि एक व्यक्ति को अपने पिता का शव दफनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट आना पड़ा।
फटकार लगाते हुए जवाब मांगा
हमें इस बात का भी दुख है कि राज्य शासन के साथ ही हाईकोर्ट भी इस समस्या का हल नहीं कर सका। कोर्ट ने सवाल किया कि गांव में रहने वाले व्यक्ति को वहां क्यों नहीं दफनाया जाना चाहिए? उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि इतने लंबे समय तक उन ईसाई आदिवासियों के खिलाफ कोई आपत्ति क्यों नहीं उठाई गई, जिन्हें दफनाया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को फटकार लगाते हुए जवाब मांगा है। इस मामले की सुनवाई अब बुधवार को होगी।




