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परती भूमि बनी किसान की कमाई का जरिया, उन्नत तिल उत्पादन तकनीक से दोगुना हुआ उत्पादन

कृषि विज्ञान केन्द्र बालोद की पहल से किसान भुवन लाल ने अपनाई वैज्ञानिक खेती, तिल की उपज 2.40 से बढ़कर 4.70 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पहुंची

 

रितेश कुमार क्राइम रिपोर्टर (पत्रकार)

बालोद, 09 जुलाई 2026

 कृषि विज्ञान केंद्र बालोद द्वारा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के क्लस्टर फ्रंट लाइन डेमॉस्ट्रेशन तिलहन कार्यक्रम के अंतर्गत किसानों की आय में वृद्धि एवं परती भूमि के समुचित उपयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से ग्राम पुसावाड़ के प्रगतिशील कृषक श्री भुवन लाल के खेत पर तिल की उन्नत किस्म ’उन्नत रामा’ का प्रदर्शन किया गया। इस प्रदर्शन का मुख्य उद्देश्य किसानों को आधुनिक एवं वैज्ञानिक खेती की तकनीकों से परिचित कराना तथा पारंपरिक खेती की तुलना में उन्नत तकनीकों के लाभों को उनके खेत पर प्रदर्शित करना था। श्री भुवन लाल पूर्व में अपने खेत के एक हिस्से को परती छोड़ देते थे, जिससे भूमि का समुचित उपयोग नहीं हो पाता था और अतिरिक्त आय का अवसर भी नहीं मिल पाता था। कृषि विज्ञान केंद्र बालोद के वैज्ञानिकों द्वारा उन्हें परती भूमि में तिल की खेती करने की सलाह दी गई तथा उन्नत उत्पादन तकनीकों का प्रशिक्षण एवं तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान किया गया। किसान ने वैज्ञानिकों की सलाह पर विश्वास करते हुए अपने खेत में तिल की उन्नत खेती प्रारंभ की।

 

प्रदर्शन के दौरान किसान को उन्नत किस्म ’उन्नत रामा’ सीड कम फर्टिलाइजर ड्रिल द्वारा कतारों में बुवाई, ट्राइकोडर्मा एवं जैव उर्वरकों से बीज उपचार, संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन, समय पर खरपतवार नियंत्रण, तथा रोग एवं कीटों के समेकित प्रबंधन की तकनीकों को अपनाने की सलाह दी गई। रोग नियंत्रण हेतु टेबुकोनाजोल एवं सल्फर का तथा कीट नियंत्रण हेतु प्रोफेनोफॉस का अनुशंसित मात्रा में छिड़काव कराया गया। कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने फसल की बुवाई से लेकर कटाई तक नियमित रूप से खेत का निरीक्षण कर आवश्यक तकनीकी सलाह भी प्रदान की। इन वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाने का परिणाम अत्यंत उत्साहजनक रहा। जहाँ किसान की पारंपरिक पद्धति से केवल 2.40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन प्राप्त होता था, वहीं उन्नत तकनीक अपनाने से 4.70 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त हुई, जो लगभग 95.83 प्रतिशत अधिक रही। इसी प्रकार किसान की शुद्ध आय 04 हजार प्रति हेक्टेयर से बढ़कर 16,600 रूपये प्रति हेक्टेयर हो गई तथा लाभ लागत अनुपात 1.38 से बढ़कर 2.43 तक पहुँच गया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि उन्नत तकनीकों को अपनाकर कम लागत में अधिक उत्पादन एवं बेहतर लाभ प्राप्त किया जा सकता है।

अपना अनुभव साझा करते हुए किसान श्री भुवन लाल ने बताया कि पहले उन्हें यह विश्वास नहीं था कि परती भूमि में तिल की खेती इतनी लाभदायक हो सकती है। लेकिन कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में उचत तकनीकों को अपनाने के बाद उन्हें अपेक्षा से कहीं अधिक उत्पादन एवं आर्थिक लाभ प्राप्त हुआ। उन्होंने कहा कि भविष्य में वे अधिक क्षेत्र में तिल की खेती करेंगे तथा अपने आसपास के किसानों को भी उन्नत तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित करेंगे।   

कृषि विज्ञान केंद्र बालोद के वैज्ञानिकों ने बताया कि जिले में बड़ी मात्रा में भूमि खरीफ मौसम में परती रह जाती है। यदि किसान ऐसी भूमि में तिल जैसी कम अवधि एवं कम पानी में सफल होने वाली तिलहनी फसलों की उन्नत किस्मों का वैज्ञानिक पद्धति से उत्पादन करें, तो न केवल उनकी आय में वृद्धि होगी बल्कि तिलहन उत्पादन बढ़ने से देश की खाद्य तेलों पर निर्भरता कम करने में भी महत्वपूर्ण योगदान मिलेगा। वैज्ञानिकों ने किसानों से अपील की कि वे कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रमों, प्रदर्शनों एवं तकनीकी गतिविधियों से जुड़कर आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाएँ और अपनी खेती को अधिक लाभकारी एवं टिकाऊ बनाएँ।

 

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