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सुप्रीम कोर्ट ने माना, आधार कार्ड नागरिकता का सबूत नहीं:जिंदा लोगों को मृत बताने पर चुनाव आयोग बोला- गलतियां स्वाभाविक; बिहार SIR पर हुई सुनवाई 

By Dinesh chourasiya

RJD सांसद मनोज झा की तरफ से पैरवी कर रहे वकील कपिल सिब्बल ने कहा- बिहार की वोटर लिस्ट में 12 जीवित लोगों को मृतक बताया गया है।

चुनाव आयोग की तरफ से सीनियर वकील राकेश द्विवेदी ने कहा-

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इस प्रकार की एक्सरसाइज में कुछ गलतियां स्वाभाविक थीं। यह दावा करना कि मृतकों को जीवित और जीवित को मृत घोषित किया गया, यह सही किया जा सकता है, क्योंकि यह एक मसौदा था।

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इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा-

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तथ्यों और आंकड़ों के साथ तैयार रहें, क्योंकि प्रक्रिया शुरू होने से पहले वोटरों की संख्या, प्रोसेस से पहले और अब मृतकों की संख्या समेत अन्य कई सवाल उठेंगे।

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आधार नागरिकता का पक्का सबूत नहीं-SC

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को भारतीय चुनाव आयोग के इस विचार का समर्थन किया कि आधार को नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए, और कहा कि इसका स्वतंत्र रूप से सत्यापन किया जाना चाहिए।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ बिहार मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। न्यायमूर्ति कांत ने याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वकील कपिल सिब्बल से कहा, ‘चुनाव आयोग का यह कहना सही है कि आधार को नागरिकता के निर्णायक प्रमाण के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसका सत्यापन किया जाना चाहिए।’

इससे पहले 29 जुलाई को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा था कि अगर बड़े पैमाने पर वोटर्स के नाम कटे हैं, तो हम हस्तक्षेप करेंगे।

SIR को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं का कहना है कि 65 लाख मतदाताओं के नाम काटे जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि इनमें से कुछ अपना घर छोड़कर कहीं और चले गए हैं, कुछ मर गए हैं।

इसके पहले सुप्रीम कोर्ट ने SIR पर रोक से इनकार कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने ADR से कहा था- ‘अगर खामी मिली तो पूरी प्रक्रिया रद्द कर देंगे।’

साथ ही चुनाव आयोग से पूछा था कि आधार कार्ड, वोटर आईडी और राशन कार्ड को मतदाता पहचान के लिए स्वीकार क्यों नहीं किया जा रहा है।

चुनाव आयोग ने कहा था, ‘राशन कार्ड पर विचार नहीं किया जा सकता। यह बहुत बड़े पैमाने पर बना है, फर्जी होने की संभावना अधिक है।’

SC ने कहा था- अगर बात फर्जीवाड़े की है तो धरती पर कोई ऐसा डॉक्यूमेंट नहीं है, जिसकी नकल न हो सके। ऐसे में 11 दस्तावेजों के आपके सूचीबद्ध करने का क्या आधार है?

8 अगस्त को कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से मांगी थी ठोस दलीलें

इसके पहले कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से कहा था कि 8 अगस्त तक अपनी याचिका में लगाए गए आरोपों का ठोस आधार और दलील दें।

वहीं, चुनाव आयोग को निर्देश दिया था कि वो SIR प्रक्रिया के दौरान हटाए गए 65 लाख मतदाताओं के नामों की लिस्ट अदालत में पेश करें।

चुनाव आयोग ने SC से कहा- वह कानूनी तरीके से अपना काम कर रहा

वहीं 12 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई से पहले दाखिल जवाब में चुनाव आयोग ने कहा है कि वह कानूनी तरीके से अपना काम कर रहा है। ऐसा कानून जरूरी नहीं कि ड्राफ्ट लिस्ट से हटे नामों की लिस्ट सार्वजनिक की जाए। चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि SIR के दौरान बिना नोटिस जारी किए किसी भी मतदाता का नाम लिस्ट से नहीं हटाया जाएगा। ​​​​​​

NGO ने दायर की थी याचिका

निर्वाचन आयोग के 24 जून को वोटर लिस्ट रिवीजन को लेकर दिए गए आदेश के बाद NGO ने याचिका दायर कर कई गंभीर सवाल खड़े किए थे।

पिछले दिनों एनजीओ की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में एक और आवेदन दिया गया, जिसमें कहा गया कि 65 लाख हटाए गए मतदाताओं के नाम सार्वजनिक किए जाए।

याचिकाकर्ता के वकील ने क्या दी दलील

कोर्ट में एनजीओ की ओर से वकील प्रशांत भूषण ने कहा था, 65 लाख मतदाताओं के नाम हटाने के कारण बताए जाएं, क्योंकि अभी एक ड्राफ्ट के रूप में सूची है।

प्रशांत भूषण ने कोर्ट को यह भी बताया था कि कुछ राजनीतिक दलों को हटाए गए मतदाताओं की सूची दी गई है, जिसमें यह नहीं बताया गया कि जिसका नाम हटाया गया है, वो मतदाता मर गया है या पलायन कर गया है।

जानिए क्या है मामला

बिहार में मतदाता सूची को ठीक करने के लिए निर्वाचन आयोग ने SIR प्रक्रिया चलाई थी। गहन पुनरीक्षण कर वोटर सूची से उन लोगों के नाम हटाने की बात हुई, जो या तो मृत हो गए है या फिर स्थानांतरित हो गए हैं या फिर जिसके एक से ज्यादा वोटर कार्ड हैं।

कई संगठनों और याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया में व्यापक स्तर पर अनियमितताएं हुई हैं। वैध मतदाताओं के नाम भी सूची से हटा दिए गए हैं।

ड्राफ्ट सूची पर सियासत जारी

ड्राफ्ट सूची पर सभी लोगों को दावा आपत्ति के लिए निर्वाचन आयोग ने 8 अगस्त तक की तारीख तय की थी। इतने दिनों के बाद भी कई राजनीतिक दल ने आधिकारिक रूप से निर्वाचन आयोग के पास कोई भी आपत्ति दर्ज नहीं की गई।

राजनीतिक दलों का लगातार बयानबाजी चल रहा है। राजनीतिक दलों के लगाए गए आरोप और अभी की जारी जानकारी ने राजनीतिक दलों की गंभीरता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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