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फंड की कमी से फंस रहा जल जीवन मिशन 15.15 करोड़ ग्रामीण परिवारों तक पानी पहुंचा; 4.18 करोड़ बाकी, कोरोना में 2 साल काम नहीं हुआ

By Dinesh chourasiya

महोबा के बिलबई गांव की तस्वीर, हैंडपंप के पास बैठी महिलाएं। 2023 में महोबा को जल जीवन मिशन की वर्क प्रोग्रेस में दूसरी रैंक मिली थी। - Dainik Bhaskar
महोबा के बिलबई गांव की तस्वीर, हैंडपंप के पास बैठी महिलाएं। 2023 में महोबा को जल जीवन मिशन की वर्क प्रोग्रेस में दूसरी रैंक मिली थी।

घर-घर पीने का शुद्ध पानी पहुंचाने के मकसद से 15 अगस्त 2019 को शुरू की गई जल जीवन मिशन योजना अधर में लटकी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस योजना की शुरुआत करते हुए मार्च 2024 तक इसे पूरा करने का टारगेट रखा था।

योजना की रफ्तार धीमी होने के पीछे कोरोना, फंड की कमी जैसे कारण हैं। इसे पूरा करने के लिए समय भी ज्यादा दिया जाना चाहिए।

योजना की शुरुआत हुई तब देशभर में 3.24 करोड़ परिवारों को ही नल से जल की सुविधा थी। बीते पांच सालों में 15.15 करोड़ ग्रामीण परिवारों तक पानी पहुंचाया गया है। यह कुल ग्रामीण आबादी का करीब 78% है।

योजना की रफ्तार धीमी, 3 वजह

1. फंड की कमी, पेमेंट नहीं हो रहा दुर्गम भूभाग और खास तौर पर पानी की कमी वाले इलाकों में अभी भी 4.18 करोड़ परिवारों तक इस योजना का लाभ पहुंचना बाकी है। इनमें राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड जैसे इलाके प्रमुख हैं। दरअसल, इन इलाकों तक पानी पहुंचाने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ रही है। केंद्रीय फंड की कमी और पहले से हो चुके काम का भुगतान न होने के कारण यह योजना अटक गई है।

3. मटेरियल और वर्कर्स की समस्या शुरुआत में योजना का बजट 3.60 लाख करोड़ रुपए था। इसमें केंद्रीय हिस्सेदारी 2.08 लाख करोड़ और राज्य की 1.52 लाख करोड़ रुपए रही। मिशन आगे बढ़ने के साथ ही दूरदराज के क्षेत्रों में बुनियादी ढांचा न होने के कारण लागत बढ़ती गई। संशोधित बजट बढ़कर 8.33 लाख करोड़ रुपए हो गया।

यह अनुमान के दोगुने से ज्यादा है। इसमें केंद्र की हिस्सेदारी 4.33 लाख करोड़ और राज्यों की 4.00 लाख करोड़ रु. है। शुरुआत में ऐसे इलाके थे, जहां भू-जल था, तो बजट की जरूरत कम थी। बाकी इलाकों में काम चुनौतीपूर्ण है, इसलिए बजट की ज्यादा जरूरत है। फंड की कमी से काम धीमा हो गया है। एजेंसियों को मटेरियल और कामगारों की सप्लाई बनाए रखने में दिक्कत आने लगी है।

4. कोरोना में काम नहीं, पाइप कम पड़े कोविड के चलते दो वर्ष काम नहीं हो सका। प्रोजेक्ट में लगने वाले डक्टाइल आयरन पाइप की भी कमी रही। इस पाइप को बनाने वाले भी सीमित हैं। पाइप की मांग अचानक बढ़ने से सप्लाई में देरी हुई है। इससे भी काम प्रभावित हुआ है।

जानकार बताते हैं-

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योजना को गुणवत्तापूर्ण तरीके से पूरा करने के लिए इसकी फंडिंग और काम पूरा करने का समय बढ़ाने की जरूरत है।

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मप्र में 1500 करोड़ से अधिक का पेमेंट अटका केंद्र ने इस वित्त वर्ष में मप्र को मिशन के लिए 4,044 करोड़ रु. और राज्य ने 7,671.60 करोड़ रु. का अलॉट किए हैं। जल जीवन मिशन की गाइडलाइन के मुताबिक वर्क ऑर्डर में केंद्र-राज्य का हिस्सा 50-50% और व्यावसायिक गतिविधियों में 60-40% होगा।

बीते साल जल जीवन मिशन के तहत मप्र में 10,773.41 करोड़ रुपए खर्च हुए थे। फिलहाल इस योजना के तहत 1500 करोड़ रु. से अधिक राशि का भुगतान रुका हुआ है। पुराने आंकड़ों को देखते हुए 2024-25 में राज्य में इस योजना के लिए कम से कम 17,000 करोड़ रु. की जरूरत होगी।

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