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सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड सरकार पर लगाया1 लाख का जुर्माना:कहा-  अधिकारी इसके जिम्मेदार

By Dinesh chourasiya

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि हम बार-बार चेतावनी के बावजूद राज्य सरकारों और पब्लिक सेक्टर यूनिट्स (PSU) की बेकार याचिकाओं से तंग आ चुके हैं। जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने कहा कि ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मुकदमेबाजी का खर्च अधिकारियों को नहीं उठाना पड़ता।

बेंच ने कहा कि हम छह महीने से कह रहे हैं। चेतावनी के बावजूद राज्य सरकारें और PSU ऐसी बेकार याचिकाएं दायर करने से परहेज नहीं करतीं। उनके रवैये में सुधार की कमी दिख रही है। बेंच ने झारखंड सरकार की अपील खारिज करते हुए उस पर एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया। जुर्माना आदेश की तारीख से चार सप्ताह के भीतर चुकाना होगा।

बेंच झारखंड सरकार की एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। रांची हाईकोर्ट ने सरकार को उसके एक कर्मचारी रवींद्र गोप को बहाल करने का आदेश दिया था। जिसके खिलाफ झारखंड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।

सुप्रीम कोर्ट के अन्य महत्वपूर्ण फैसले…

SC बोला- बाल विवाह जीवनसाथी चुनने का अधिकार छीनता है

बाल विवाह को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (18 अक्टूबर) को फैसला सुनाया। CJI डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने कहा, बाल विवाह रोकने के लिए हमें अवेयरनेस की जरूरत है, सिर्फ सजा के प्रावधान से कुछ नहीं होगा।

CJI ने कहा, हमने बाल विवाह की रोकथाम पर बने कानून (PCMA) के उद्देश्य को देखा और समझा। इसके अंदर बिना किसी नुकसान के सजा देने का प्रावधान है, जो अप्रभावी साबित हुआ। हमें जरूरत है अवेयरनेस कैंपेनिंग की।

सुप्रीम कोर्ट ने 10 जुलाई को सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। याचिका सोसाइटी फॉर एनलाइटनमेंट एंड वॉलेंटरी एक्शन ने 2017 में लगाई थी। NGO का आरोप था कि बाल विवाह निषेध अधिनियम को शब्दशः लागू नहीं किया जा रहा है

सद्गुरु के ईशा फाउंडेशन पर बंधक बनाने का केस बंद सुप्रीम कोर्ट ने दो लड़कियों को बंधक बनाने के मामले में सद्गुरु जग्गी वासुदेव के ईशा फाउंडेशन के खिलाफ केस बंद कर दिया है। CJI डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने शुक्रवार को कहा कि मद्रास हाईकोर्ट का ऐसी याचिका पर जांच के आदेश देना सही नहीं था। आश्रम में पुलिस का छापा भी गलत था।

कोर्ट ने कहा कि लड़कियों के पिता की याचिका गलत है, क्योंकि दोनों लड़कियां बालिग हैं, जब वे आश्रम में गई तो उनकी उम्र 27 और 24 साल थी। वो अपनी मर्जी से आश्रम में रह रही हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस फैसले का असर सिर्फ इसी केस तक सीमित रहेगा।

ईशा फाउंडेशन के खिलाफ रिटायर्ड प्रोफेसर एस कामराज ने मद्रास हाईकोर्ट में याचिका लगाई थी। उनका आरोप था कि आश्रम में उनकी बेटियों लता और गीता को बंधक बनाकर रखा गया है।

हाईकोर्ट ने 30 सितंबर को मामले के खिलाफ जांच करने और ईशा फाउंडेशन से जुड़े सभी क्रिमिनल केसों की डिटेल पेश करने का आदेश दिया था। फाउंडेशन ने हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। कोर्ट ने 3 अक्टूबर को मद्रास हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी।

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