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CG में 17 करोड़ का फर्जी सर्पदंश मुआवजा घोटाला मामले में , 3 क्लर्क गिरफ्तार सहित सस्पेंड गिरफ्तारी के विरोध में लिपिक संघ; सामूहिक अवकाश की चेतावनी

By Dinesh chourasiya

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में चर्चित फर्जी सर्पदंश मुआवजा मामले में विवाद बढ़ता जा रहा है। तहसील कार्यालय के 3 कर्मचारियों (क्लर्क) की गिरफ्तारी के बाद उन्हें सस्पेंड कर दिया गया है। वहीं, अब 8 अन्य कर्मचारियों के बयान होने बाकी हैं।

सोमवार को गिरफ्तारी के विरोध में छत्तीसगढ़ प्रदेश राजस्व लिपिक संघ और छत्तीसगढ़ कनिष्ठ प्रशासनिक सेवा संघ ने प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। संघों ने निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए ज्ञापन सौंपा है और जरूरत पड़ने पर सामूहिक अवकाश पर जाने की चेतावनी दी है।

पुलिस ने तहसील कार्यालय के कर्मचारी गरीब बिंझवार, नरेंद्र कौशिक और हरिराम राठौर को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। इससे पहले गोविंद विश्वकर्मा, वकील खांडेकर और डॉक्टर प्रियंका सोनी की भी गिरफ्तारी हो चुकी है। पुलिस के मुताबिक, अब 8 अन्य कर्मचारियों के बयान दर्ज किए जाने हैं।

एक दिन की हड़ताल से कामकाज ठप

इधर, लिपिकों (क्लर्क) की गिरफ्तारी के विरोध में तहसील कार्यालय के कर्मचारियों ने लिपिक संघ के नेतृत्व में पूरे दिन हड़ताल की। इससे पहले भी 20 जुलाई को कर्मचारियों ने प्रदर्शन किया था। हड़ताल की पहले से जानकारी नहीं होने के कारण दूर-दराज से आए लोगों को काफी परेशानी हुई। उनका काम नहीं हो सका और उन्हें वापस लौटना पड़ा।

हड़ताल की वजह से तहसील का काम पूरी तरह बंद रहा। सीमांकन, बंटवारा और नामांतरण जैसे मामलों की सुनवाई नहीं हो सकी। फाइलें भी लंबित पड़ी रहीं। हालात ऐसे थे कि तहसीलदार कोर्ट में मौजूद थे, लेकिन फाइलें पेश करने के लिए कोई कर्मचारी नहीं था।

अब तबादले के जुगाड़ में जुटे कर्मचारी

जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है, मामले में नए खुलासे हो रहे हैं। पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई के डर से तहसील के कई कर्मचारी अब अपना तबादला कराने की कोशिश में जुट गए हैं।

वहीं, इस मामले में सात तहसीलदारों को भी नोटिस जारी किया गया है। इसके विरोध में छत्तीसगढ़ कनिष्ठ प्रशासनिक सेवा संघ ने तहसीलदारों का पक्ष रखा है। संघ ने पूरी प्रक्रिया का हवाला देते हुए शासन के वरिष्ठ अधिकारियों को ज्ञापन भी सौंपा है।

8 लिपिकों का होना है बयान, संघ ने खोला मोर्चा

सरकंडा थाना में आर्थिक सहायता मामलों में दर्ज एफआईआर के बाद तीन राजस्व लिपिकों की गिरफ्तारी हो चुकी है। अब अन्य लिपिकों की गिरफ्तारी की भी आशंका जताई जा रही है। पुलिस ने 8 लिपिकों को बयान दर्ज कराने के लिए थाने बुलाया है।

वहीं, तीन लिपिकों की गिरफ्तारी के बाद मामला और गरमा गया है। छत्तीसगढ़ प्रदेश राजस्व लिपिक संघ ने इस कार्रवाई का विरोध करते हुए संभागायुक्त, आईजी और कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा है।

संघ ने बाकी राजस्व लिपिकों के खिलाफ कार्रवाई रोकने और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। संघ का कहना है कि पूरी जांच से पहले कर्मचारियों को आरोपी बनाया जा रहा है, जिससे राजस्व कर्मचारियों में डर का माहौल है।

बयान के लिए बुलाया, फिर कर दी गिरफ्तारी

संघ के पदाधिकारियों का कहना है कि सरकंडा थाने में दर्ज अलग-अलग मामलों में तीन राजस्व लिपिकों को पहले बयान देने के लिए बुलाया गया, लेकिन बाद में उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।

संघ का कहना है कि इसके बाद आठ अन्य लिपिकों को भी बयान के लिए नोटिस दिया गया। सभी कर्मचारी 23 जुलाई को थाने पहुंचे और जांच में पूरा सहयोग किया। इसके बावजूद उन्हें कार्रवाई का डर बना हुआ है।

पीठासीन अधिकारी को मुआवजा मंजूर करने का अधिकार

ज्ञापन में कहा गया है कि प्राकृतिक आपदा में मौत होने पर परिजनों को 4 लाख रुपए की आर्थिक सहायता शासन के तय नियमों के अनुसार दी जाती है।

आवेदन मिलने के बाद उससे जुड़े सभी दस्तावेज कोर्ट में पेश किए जाते हैं। रीडर और वाचक का काम केवल दस्तावेज पेश करना और रिकॉर्ड संभालना होता है। अंतिम फैसला लेने और मुआवजा मंजूर करने का अधिकार संबंधित पीठासीन अधिकारी के पास होता है।

रीडरों को आरोपी बनाने पर संघ ने जताई आपत्ति

संघ का कहना है कि जांच में फर्जी हस्ताक्षर, फर्जी सील और झूठे शपथ पत्रों के जरिए आदेश लेने की बात सामने आई है। अगर ऐसा हुआ है तो पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और असली दोषियों पर कार्रवाई की जानी चाहिए।

संघ का कहना है कि सिर्फ दस्तावेज पेश करने वाले रीडरों को आरोपी बनाना सही नहीं है। उनका काम केवल फाइल और दस्तावेज कोर्ट में पेश करना होता है।

सामूहिक अवकाश पर जाने की चेतावनी

संघ ने कहा है कि अगर कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं रोकी गई और उन्हें कानूनी सुरक्षा नहीं दी गई, तो जिले के सभी राजस्व लिपिक सामूहिक अवकाश पर चले जाएंगे। ऐसा होने पर तहसील कार्यालयों में राजस्व से जुड़े कई काम प्रभावित हो सकते हैं।

जानिए क्या है सर्पदंश के नाम पर फर्जीवाड़ा

जशपुर जिले में पिछले तीन साल में सर्पदंश से 96 मौतें दर्ज हुईं। वहीं, अकेले बिलासपुर में 431 मौतें दिखाकर 17 करोड़ 24 लाख रुपए का मुआवजा बांट दिया गया। बेलतरा विधायक सुशांत शुक्ला ने यह मामला विधानसभा में उठाया, जिसके बाद काफी हंगामा हुआ। इसके बाद राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा ने मामले की उच्चस्तरीय जांच और दोषियों पर सख्त कार्रवाई का भरोसा दिया।

सरकारी नियमों के मुताबिक सर्पदंश से मौत होने पर परिजनों को 4 लाख रुपए की आर्थिक सहायता मिलती है। जांच में सामने आया कि इसी योजना का गलत फायदा उठाने के लिए फर्जी दस्तावेज बनाए गए। कई सामान्य मौतों को भी सर्पदंश से हुई मौत बताकर मुआवजा ले लिया गया।

जांच में यह भी पता चला कि कुछ मामलों में परिजनों की जानकारी या सहमति के बिना ही मुआवजे की राशि निकाल ली गई और आरोपियों ने आपस में बांट ली।

बिलासपुर में फर्जी स्नेक बाइट मुआवजा घोटाले में अब तक डॉक्टर, पुलिसकर्मी और तहसील कर्मचारियों समेत 17 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। जांच में सामने आया है कि ‘एडवोकेट डायमंड गैंग’ में पुलिस, स्वास्थ्य और राजस्व विभाग के अधिकारी-कर्मचारी शामिल थे। अस्पताल में किसी की मौत की सूचना मिलते ही गैंग एक्टिव हो जाता था और सर्पदंश का फर्जी केस बनाकर करीब 1.5 लाख रुपए में सेटिंग की जाती थी।

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