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सुप्रीम कोर्ट बोला- पड़ोसियों के बीच में झगड़ा आम बात:उसे अपराध नहीं मान सकते; कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला रद्द किया

By Dinesh chourasiya

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा- पड़ोसियों में झगड़ा होना आम बात है। अगर पड़ोसियों के बीच में झगड़ा, बहस और हाथापाई भी हो जाती है तो उसे आत्महत्या के लिए उकसाने (IPC की धारा 306) के तहत अपराध नहीं माने जा सकते।

जस्टिस बीवी नागरत्ना और के वी विश्वनाथन की बेंच ने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें एक महिला को पड़ोसी की आत्महत्या के लिए तीन साल की सजा सुनाई गई थी।

कोर्ट ने कहा, धारा 306 में आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला तभी बनता है, जब यह साफ हो कि आरोपी ने जानबूझकर पीड़ित को आत्महत्या करने के लिए मजबूर किया हो।

कोर्ट ने कहा- कैसे माने आत्महत्या के लिए मजबूर किया

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस केस में आरोपी और पीड़ित के परिवारों के बीच तीखी बहस हुई थी। लेकिन यह नहीं माना जा सकता कि आरोपी ने पीड़ित को आत्महत्या करने के लिए मजबूर किया।

बेंच ने कहा, ऐसे झगड़े रोजमर्रा की जिंदगी में होते हैं। तथ्यों के आधार पर हम यह नहीं मान सकते कि आरोपी ने इतना उकसाया कि पीड़ित के पास आत्महत्या के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा।

अब पूरा मामला समझिए…

यह मामला 2008 में कर्नाटक का है। एक महिला और उसकी पड़ोसी (पीड़िता) के बीच छह महीने तक झगड़े और कहासुनी होती रही। पीड़िता (निजी स्कूल में शिक्षिका) ने आरोप लगाया कि पड़ोसी महिला लगातार उसे परेशान करती है, जिससे वह मानसिक तनाव में जी रही थी। कथित तौर पर इसी तनाव से तंग आकर उसने आत्महत्या कर ली।

घटना के बाद आरोपी पर IPC धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत मामला दर्ज किया गया। कर्नाटक हाईकोर्ट ने आरोपी को तीन साल की सजा सुनाई, हालांकि SC/ST एक्ट से उसे बरी कर दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने सजा रद्द कर दी है।

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