
दुर्ग में पंचायतों के मनमाने फैसले:प्रेम विवाह किया तो मां की अर्थी को कंधा तक नहीं देने दिया
By Dinesh chourasiya
भिलाई के उतई से लगे गांव में साहू समाज के लोगों ने प्रेम साहू को उनकी मां की अर्थी को कंधे नहीं देने दिया। अपराध सिर्फ इतना था कि उन्होंने स्वजातीय युवती से प्रेम विवाह कर लिया था। वे अपनी मां के अंतिम संस्कार में सिर्फ शामिल हो सके। बेटे के रूप में अंतिम संस्कार का कोई भी दायित्व उन्हें नहीं निभाने दिया गया। बाद में समाज ने 35 हजार रुपए अर्थदंड लेकर समाज में शामिल किया। दुर्ग जिले के ही एक अन्य गांव में कुर्मी समाज ने दिल्लीवार परिवार का बहिष्कार कर रखा है।
फरमान है कि अगर किसी ने इस परिवार को बुलाया या उनके यहां गया तो उसे भी बेदखल कर दिया जाएगा। पीड़ित परिवार का अपराध इतना है कि उसने 5 साल पूर्व 2 गांव में 50 रुपए चंदा देने से मना कर दिया था। खाप पंचायतों के फरमानों की तर्ज पर छत्तीसगढ़ के ये दो मामले बानगी मात्र हैं। प्रदेश में ऐसे ढेरों मामले हैं, जिनमें पंचायत-समाजों के कठोर फैसलों का खमियाजा परिवार भुगत रहे हैं। अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के सर्वे के मुताबिक प्रदेश में ऐसे 30 हजार से ज्यादा परिवार हैं, जिन्हें बेदखल किया गया। भास्कर ने कुछ और पीड़ितों से उनकी आपबीती सुनी।







धमधा ब्लॉक के एक गांव में हाल में साहू समाज ने नाई बिरादरी की युवती से शादी करने पर युवक के परिवार पर 1 लाख रुपए अर्थदंड लगाया। शर्त भी रखी कि युवती को समाज स्वीकार तो कर रहा है, लेकिन वह घर-परिवार में होने वाले किसी भी कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सकेगी। कभी अपने मां-बाप से भी मिलने नहीं जा सकेगी।
दुर्ग से सटे एक गांव में कुर्मी समाज ने दूसरे समाज की युवती से शादी कर ली। समाज पंचायत जुटी और उसने युवक के परिवार को 20 हजार रुपए अर्थदंड और पांघर को झारा-झारा तथा प्रत्येक घर से एक-एक व्यक्ति को भात खिलाने की सजा सुनाई गई। यह गरीब परिवार समाज के सामने गिड़गिड़ाता रहा मगर कोई सुनवाई नहीं हुई।
सामाजिक बहिष्कार जैसी कुरीति के खिलाफ सख्त, प्रभावी कानून महाराष्ट्र में बन गया, लेकिन छत्तीसगढ़ में समाज के दबाव में फैसला नहीं हो पा रहा है। समाज के चंद लोग अपनी अहम संतुष्टि के लिए लोगों को जीते-जी मर जाने वाले फरमान सुनाते हैं। इस तरह के सभी फैसले मौखिक होते हैं, लिखित में कोई नहीं सुनाता इसलिए पीड़ित परिवार कानून का भी सहारा नहीं ले पाता। समाज को अपनी सोच बदलने की जरूरत है।








