चुनाव आयोग ने कानून तोड़ा होगा तो फैसले रोक देंगे’:सुप्रीम कोर्ट का SIR के 14 फैसलों पर नोटिस, CEC ज्ञानेश को सस्पेंड करने से इनकार
By Dinesh chourasiya
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने का अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया। उन पर SIR से जुड़े करीब 14 फैसले दो अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लेने का आरोप है।







सुप्रीम कोर्ट ने इन आरोपों पर चुनाव आयोग से जवाब मांगा है। कोर्ट ने कहा कि अगर फैसले बिना सहमति के लिए पाए गए, तो उन्हें वापस लिया जा सकता है।
CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने याचिका पर केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, CEC ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयुक्त डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी, डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर मनीष गर्ग और DG (IT) सीमा खन्ना को नोटिस जारी किया।




कोर्ट रूम LIVE…
विकास सिंह (याचिकाकर्ता के वकील): 2023 के नए कानून से चुनाव आयोग की शक्तियां बढ़ गई हैं। आयोग के काम करने के तरीके में भी बदलाव हुआ है। अनूप बरनवाल केस के बाद अब स्थिति बदल गई है। चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं और लोग खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
CJI सूर्यकांत: कानून में क्या बदलाव किया गया है?
विकास सिंह: CEC और चुनाव आयुक्तों को कानूनी सुरक्षा दी गई है। अब चुनाव आयोग दूसरे संवैधानिक संस्थानों से भी ज्यादा ताकतवर हो गया है।
मेनका गुरुस्वामी (याचिकाकर्ता की ओर से): मैं अपनी सभी मांगों पर कायम हूं। एक ऐसे कानून के जरिए गलत कामों को सुरक्षा दी जा रही है, जो खुद संविधान के खिलाफ है। क्या ऐसे काम को सरकारी ड्यूटी माना जा सकता है? हम हमेशा स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव देखते आए हैं, लेकिन अब ऐसा नहीं लगता। ऐसे कामों के लिए मंजूरी कहां है?
कोर्ट: इस मामले में नोटिस जारी किया जाता है।
गुरुस्वामी: दिल्ली में SIR किस तरह किया गया, यह देखना जरूरी है। फॉर्म-6 में दो नई शर्तें जोड़ी गई हैं। मुझे भी इसका नोटिस मिला है। अब एक और चुनाव होने वाला है। ऐसे में CEC का काम निष्पक्ष नहीं कहा जा सकता।
CJI सूर्यकांत: आपकी सभी मांगें अभी आपस में जुड़ी हुई लग रही हैं।
विकास सिंह: कोर्ट चाहे तो अगली सुनवाई तक चुनाव आयोग को निर्देश दे सकता है कि सभी फैसले सिर्फ सर्वसम्मति से लिए जाएं।
CJI सूर्यकांत: आयोग से उम्मीद की जाती है कि वह सर्वसम्मति से फैसला लें। लेकिन अगर सहमति नहीं बनती, तो बहुमत से भी फैसला लिया जा सकता है। अभी आप सिर्फ एक खबर के आधार पर अपनी बात रख रहे हैं।
विकास सिंह: चुनाव आयोग ने अपनी प्रेस रिलीज में आरोपों को साफ तौर पर खारिज नहीं किया है। उसका जवाब भी स्पष्ट नहीं है। कोर्ट को कहना चाहिए कि कानून में तय नियमों का उल्लंघन नहीं किया जा सकता।
CJI सूर्यकांत: कानून बना हुआ है और उन्हें उसका पालन करना होगा। अगर कानून का पालन नहीं हुआ, तो कोर्ट कार्रवाई कर सकता है।
विकास सिंह: ऐसी स्थिति में कोर्ट कौन-कौन से फैसले रद्द कर सकता है?
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला/बागची: अगर रिकॉर्ड से पता चलता है कि कोई फैसला सर्वसम्मति से नहीं लिया गया था, तो हम उस फैसले पर रोक लगा सकते हैं। उसे कानून के अधिकार से बाहर भी घोषित कर सकते हैं। लेकिन क्या हम बिना रिकॉर्ड देखे यह मान लें कि सारे फैसले अकेले लिए गए? हमें चुनाव आयोग से साफ और पारदर्शी जवाब चाहिए।
कोर्ट का आदेश: याचिका पर नोटिस जारी किया जाता है।
विकास सिंह: कानून की अलग-अलग धाराओं को देखें तो बड़ा अंतर है। आयोग में काम और जिम्मेदारियों का बंटवारा सर्वसम्मति से होना चाहिए। 2023 के कानून की धारा 16 में CEC को सुरक्षा दी गई है, जो पहले नहीं थी। इससे CEC की शक्तियां और महत्वपूर्ण हो जाती हैं।
जस्टिस बागची: यह सुरक्षा शायद सिर्फ राष्ट्रपति को मिली हुई है। ऐसी सुरक्षा तो जजों को भी नहीं मिली है।
विकास सिंह: प्रधानमंत्री को भी ऐसी सुरक्षा नहीं मिली है। मेरा कहना है कि इस कानून ने CEC को सुप्रीम कोर्ट के जजों से भी ऊपर की स्थिति में पहुंचा दिया है। मैं चाहता हूं कि कोर्ट आज ही अंतरिम आदेश देकर CEC को निलंबित करे या उन्हें CEC के तौर पर काम करने से रोके। नहीं तो यह देश जल जाएगा।
जस्टिस बागची: फिर चुनाव कौन कराएगा?
विकास सिंह: बाकी दो चुनाव आयुक्त चुनाव करा सकते हैं। देश में 76 साल से चुनाव हो रहे हैं और चुनाव आयोग की एक बड़ी प्रतिष्ठा रही है। लेकिन अब CEC पर उसी कानून के खिलाफ काम करने के आरोप हैं, जिसके तहत उनकी नियुक्ति हुई है। यह लोकतंत्र के लिए बहुत गंभीर मामला है।
विकास सिंह: लेकिन पहले हो चुके चुनाव को कोर्ट रद्द नहीं करेगा।
CJI सूर्यकांत: लोक प्रहरी मामले की सुनवाई 27 अक्टूबर को होनी है। हम इस मामले को उससे पहले सुन रहे हैं। हम देखेंगे कि नए कानून के नियमों का पालन हुआ है या नहीं।
विकास सिंह: जिन 14 मामलों का जिक्र किया जा रहा है, उनका पूरा रिकॉर्ड मंगाया जाए। रिकॉर्ड में किसी तरह की छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए।
जस्टिस बागची: क्या आपका कहना है कि दो चुनाव आयुक्तों ने इन फैसलों पर आपत्ति जताई थी?
विकास सिंह: हां, हमारा यही कहना है। कोर्ट को रिकॉर्ड देखकर सच्चाई साफ करनी चाहिए।
कोर्ट: अभी इन आरोपों पर अंतिम फैसला नहीं दिया जा सकता। चुनाव आयोग और दूसरे संबंधित पक्षों का जवाब आने के बाद पूरे मामले को देखा जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट CEC को सस्पेंड नहीं कर सकता
संविधान में सुप्रीम कोर्ट को CEC को सस्पेंड करने की कोई स्पष्ट या विशेष शक्ति नहीं दी गई है। आर्टिकल 324 के तहत चुनाव कराने और उसकी निगरानी की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की है, लेकिन आयोग के फैसलों की कोर्ट में जांच हो सकती है। अगर कोई फैसला कानून या संविधान के खिलाफ पाया जाता है, तो सुप्रीम कोर्ट उस पर रोक लगा सकता है या उसे रद्द कर सकता है।
मीडिया रिपोर्ट के बाद शुरू हुआ ज्ञानेश कुमार पर विवाद
इस पूरे मामले की शुरुआत इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट से हुई थी, जिसमें SIR को लेकर चुनाव आयोग के अधिकारियों के बीच मतभेदों का जिक्र था।
रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने चुनाव पैनल के भीतर SIR प्रक्रिया को लेकर बार-बार चिंता जताई थी।
विपक्ष अगले सत्र में महाभियोग लाने की तैयारी में
विपक्ष एक बार फिर ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की योजना बना रहा है। अप्रैल 2026 में भी विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग नोटिस दिया था लेकिन लोकसभा में वह प्रस्ताव खारिज हो गया था, जबकि राज्यसभा में अभी भी लंबित है।
ज्ञानेश कुमार पर एक्शन होगा या नहीं, 3 संभावनाएं
1. कार्यकाल के फैसलों पर पुलिस एक्शन नहीं हो सकता: ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023′ की धारा 16 के तहत सुरक्षा मिली है। जब तक यह प्रावधान मौजूद है, उन्हें केवल पुलिस कार्रवाई या गिरफ्तारी के जरिए हटाना, उन पर केस चलाना कानूनी रूप से बहुत चुनौतीपूर्ण है।
2. भाजपा ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया: ज्ञानेश कुमार का कार्यकाल जनवरी 2029 तक है, यानी अभी 2 साल कम से कम ज्ञानेश अपने पद पर रहेंगे। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। पार्टी का मानना है कि ये आरोप आधारहीन हैं।
3. आखिरी रास्ता महाभियोग, लेकिन विपक्ष के पास बहुमत संभव नहीं: अनुच्छेद 324 (5) के मुताबिक मुख्य चुनाव आयुक्त को महाभियोग के तहत ही हटाया जा सकता है। महाभियोग प्रस्ताव को पेश करने के लिए लोकसभा में 100 तो राज्यसभा में 50 सांसदों के समर्थन की जरूरत होती है। लोकसभा में स्पीकर और राज्यसभा में सभापति को यह तय करना होता है कि इसे स्वीकार किया जाए या नहीं।
मौजूदा हालात में विपक्ष को महाभियोग प्रस्ताव को पास कराने के लिए संसद के दोनों सदनों में 2/3 की जरूरत होगी। यानी लोकसभा में 362 सांसदों और राज्यसभा में 164 सांसदों का समर्थन हो। विपक्ष के पास संसद में इस वक्त इतना बड़ा समर्थन नहीं है।





