CG हाईकोर्ट मे भिलाई निगम कमिश्नर को हटाने की मांग वाली याचिका खारिज; 32 पार्षदों के प्रस्ताव को माना अवैध
By Dinesh chourasiya
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भिलाई नगर निगम के आयुक्त (कमिश्नर) राजीव पांडेय को पद से हटाने की मांग को लेकर दायर याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि बहुमत का होना अपनी जगह है, लेकिन कानूनी प्रक्रिया का पालन करना शासन की मूल शर्त है। बिना पूर्व नोटिस के सामान्य सभा में लाया गया कमिश्नर को हटाने का प्रस्ताव शुरुआत से ही अवैध था।







मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की सिंगल बेंच ने कहा कि केवल बहुमत के आधार पर कानून और निर्धारित प्रक्रिया की अनदेखी नहीं की जा सकती। जब तक कोई प्रस्ताव कानूनी प्रक्रिया के अनुसार पारित नहीं होता, तब तक राज्य सरकार को उसे लागू करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

32 पार्षदों ने दायर की थी याचिका




भिलाई नगर निगम के पार्षद संदीप निरंकारी, आदित्य सिंह समेत 32 निर्वाचित पार्षदों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि आयुक्त राजीव पांडेय मेयर-इन-काउंसिल और सामान्य सभा की मंजूरी के बिना वित्तीय और प्रशासनिक फैसले ले रहे हैं। इसी आधार पर उन्हें पद से हटाने की मांग की गई थी।
पार्षदों का दावा- सरकार ने नहीं की कार्रवाई
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि 25 मार्च 2026 को आयोजित विशेष बजट सत्र की सामान्य सभा में छत्तीसगढ़ नगर पालिक निगम अधिनियम, 1956 की धारा 54 के तहत तीन-चौथाई से ज्यादा बहुमत से आयुक्त को हटाने का प्रस्ताव पारित किया गया था। इसके बावजूद राज्य सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की। पार्षदों ने इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था और कानून का उल्लंघन बताया।
हाईकोर्ट ने प्रस्ताव को माना अवैध
हाईकोर्ट ने मामले की समीक्षा के बाद पाया कि 25 मार्च की बैठक विशेष बजट बैठक थी। कोर्ट ने छत्तीसगढ़ नगरपालिका (कार्य संचालन) नियम, 2016 के नियम 3 और 5 का हवाला देते हुए कहा कि विशेष बैठक में केवल उन्हीं विषयों पर चर्चा की जा सकती है, जिनका जिक्र पहले से जारी नोटिस और एजेंडे में किया गया हो।
एजेंडे में नहीं था कमिश्नर को हटाने का मुद्दा
हाईकोर्ट ने कहा कि आयुक्त को हटाने का विषय बैठक के एजेंडे में शामिल ही नहीं था। बजट पारित करना और आयुक्त को हटाने का प्रस्ताव दो अलग-अलग विषय हैं। इसे बजट से जुड़ा सहायक या अनुषंगी विषय मानकर अंतिम समय में पेश नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि “बहुमत का होना अपनी जगह है, लेकिन कानून और निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है। बिना पूर्व नोटिस के लाया गया यह प्रस्ताव शुरुआत से ही अवैध था।”






